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दुर्गा दशैं सातवां दिन: फूलपाती प्रवेश (Fulpati) और मां कालरात्रि पूजा विधि, नवपत्रिका व गुड़ का भोग

Hindilish टीम 12 Oct 2026 अपडेट: 12 Oct 2026 6 मिनट पढ़ें 151
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दुर्गा दशैं सातवां दिन: फूलपाती प्रवेश (Fulpati) और मां कालरात्रि पूजा विधि, नवपत्रिका व गुड़ का भोग
दुर्गा दशैं सातवां दिन: फूलपाती प्रवेश (Fulpati) और मां कालरात्रि पूजा विधि, नवपत्रिका व गुड़ का भोग

दुर्गा दशैं के सातवें दिन 'फूलपाती' कैसे मनाते हैं? जानें गोरखा से काठमांडू तक फूलपाती प्रवेश की परंपरा, नवपत्रिका के ९ दिव्य पौधे, मां कालरात्रि की पूजा विधि व गुड़ का भोग।

विषय सूची

त्वरित सारांश (Quick Answer): दुर्गा दशैं के सातवें दिन को 'फूलपाती' कहा जाता है। इस दिन प्रकृति की नौ औषधीय वनस्पतियों (नवपत्रिका) को एक साथ बांधकर वैदिक मंत्रोच्चार और तोपों की सलामी के साथ दशैं घर में प्रवेश कराया जाता है। इसी रात्रि को असुर संहारक मां कालरात्रि की पूजा की जाती है, जिन्होंने रक्तबीज का वध किया था। देवी को गुड़ का भोग लगाया जाता है। इनकी कृपा से भूत-प्रेत, भय और शत्रुओं का नाश होता है।
दुर्गा दशैं : दिन ७ - फूलपाती व मां कालरात्रि नवपत्रिका प्रवेश, कालरात्रि पूजा व अंधकार पर प्रकाश की विजय

१. दुर्गा दशैं का सातवां दिन: 'फूलपाती' का राष्ट्रीय व सांस्कृतिक उल्लास

दुर्गा दशैं के सातवें दिन आश्विन शुक्ल सप्तमी को सम्पूर्ण समाज एक अलौकिक उत्सव में डूब जाता है। इस दिन को पूरे नेपाल और विश्व भर के नेपाली/गोरखा समुदायों में 'फूलपाती' (Fulpati) के नाम से जाना जाता है। इसी दिन शारदीय नवरात्रि की 'महा सप्तमी' भी होती है, जब नवदुर्गा के सातवें और सबसे उग्र स्वरूप 'मां कालरात्रि' (Maa Kalaratri) की पूजा की जाती है।

दशैं के पहले छह दिन जहां घरों के भीतर एकांत साधना, कलश पूजन और जमरा के संरक्षण के दिन होते हैं, वहीं सातवें दिन 'फूलपाती' के साथ दशैं का पर्व सार्वजनिक उल्लास, सरकारी अवकाश और सामूहिक उत्सव का रूप ले लेता है। दूर-दराज रहने वाले लोग अपने पैतृक घरों की ओर प्रस्थान करते हैं, और आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ने लगती हैं।

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२. ऐतिहासिक फूलपाती यात्रा: गोरखा से काठमांडू हनुमान ढोका

फूलपाती की परंपरा का इतिहास नेपाल के एकीकरण और गोरखा राजवंश से गहराई से जुड़ा हुआ है:

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: राजा पृथ्वी नारायण शाह के काल से यह अटूट परंपरा चली आ रही है। गोरखा दरबार (जहां मां काली और गोरखनाथ का प्राचीन मंदिर है) से विधिवत पूजा-अर्चना के बाद फूलपाती का डोली तैयार की जाती है।
  • धादिंग होते हुए काठमांडू: प्राचीन समय में धावक (पैदल सैनिक) गोरखा से लगभग १६० किलोमीटर की दूरी तय करके इस पवित्र डोली को एक ही दिन में काठमांडू पहुंचाया करते थे।
  • तुंडिखेल में शाही सलामी: काठमांडू के ऐतिहासिक मैदान 'तुंडिखेल' में नेपाली सेना द्वारा तोपों की गर्जना और बंदूकों की सलामी (Badhai) के साथ फूलपाती का स्वागत किया जाता है। इसके पश्चात राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में इसे प्राचीन राजदरबार 'हनुमान ढोका' के दशैं घर में ससम्मान प्रवेश (भित्र्याउने) कराया जाता है।
  • सामान्य घरों में परंपरा: केवल राजदरबार ही नहीं, बल्कि प्रत्येक सनातनी हिंदू अपने घर में सप्तमी के दिन गाजे-बाजे और शंख ध्वनि के साथ फूलपाती को अपने पूजा घर में स्थापित करता है।
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३. 'नवपत्रिका' (Navapatrika) के ९ दिव्य पौधे और उनका वैज्ञानिक-धार्मिक रहस्य

फूलपाती वस्तुतः प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का महापर्व है। इसमें नौ विशेष औषधीय पौधों को लाल कपड़े में लपेटकर एक साथ बांधा जाता है, जिसे 'नवपत्रिका' कहा जाता है। ये नौ पौधे नवदुर्गा के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं:

रंभा (केला): मां ब्राह्मणी का प्रतीक (विकास और तृप्ति)।

कच्ची (अरबी/कर्कलो): मां कालिका का प्रतीक।

हरिद्रा (हल्दी): मां दुर्गा का प्रतीक (आरोग्य और विषनाशक)।

जयंती (बड़हर/जयंती): मां कार्तिकी का प्रतीक (विजय का वरदान)।

बिल्व (बेल पत्र): भगवान शिव और मां शिवा का प्रतीक।

दाड़िम (अनार): मां रक्तदंतिका का प्रतीक (रक्त शुद्धि और समृद्धि)।

अशोक: मां शोकहारिणी का प्रतीक (शोक और दुखों का अंत)।

मानकचू (मानवृक्ष): मां चामुंडा का प्रतीक।

धान्य (धान की बालियां): मां लक्ष्मी का प्रतीक (अन्नपूर्णा और धन-धान्य)।

इन सभी पौधों को एक साथ दशैं घर में स्थापित करना यह सिद्ध करता है कि हमारी सनातन संस्कृति प्रकृति-पूजक है और वनस्पति ही साक्षात भगवती का स्वरूप है।

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४. कौन हैं मां कालरात्रि? (स्वरूप व रक्तबीज वध प्रसंग)

सप्तमी की मध्यरात्रि को कालरात्रि पूजा का विधान है। मां कालरात्रि का रूप देखने में अत्यंत भयानक और उग्र है, परंतु वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत दयालु और कल्याणकारी हैं। इसलिए उनका एक नाम 'शुभंकरी' भी है:

  • दिव्य भयानक रूप: देवी का वर्ण घने अंधकार और काजल के समान काला है। उनके बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत (बिजली) के समान चमकने वाली दिव्य मुंडमाला है। उनके तीन विशाल नेत्र हैं जो ब्रह्मांड की तरह गोल हैं और जिनसे अग्नि की लपटें निकलती हैं।
  • चार भुजाएं: उनके एक हाथ में तीक्ष्ण खड्ग (तलवार), दूसरे में लोहे का कांटा है। बाकी दोनों हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं, जो भक्तों को निर्भय रहने का आश्वासन देते हैं।
  • वाहन: देवी गर्दभ (गधे) पर सवार हैं।
  • रक्तबीज का वध: दुर्गा सप्तशती के अनुसार, जब रक्तबीज नामक असुर के शरीर से गिरने वाली रक्त की प्रत्येक बूंद से सैकड़ों नए असुर उत्पन्न हो रहे थे, तब मां दुर्गा के ललाट से कालरात्रि प्रकट हुईं। उन्होंने रक्तबीज का सारा रक्त अपने मुख में भर लिया और किसी भी बूंद को धरती पर गिरने नहीं दिया, जिससे उस दुष्ट का अंत संभव हो सका।
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५. सहस्रार चक्र और आंतरिक ज्ञान का द्वार

यौगिक साधना में नवरात्रि और दशैं के सातवें दिन साधक का मन 'सहस्रार चक्र' (Sahasrara Chakra) में पहुंच जाता है:

  • ब्रह्मरंध्र की स्थिति: सहस्रार चक्र सिर के शीर्ष भाग में स्थित होता है। यह मनुष्य की चेतना का सर्वोच्च शिखर है।
  • पूर्ण सिद्धि की प्राप्ति: जब मां कालरात्रि की कृपा से यह चक्र जाग्रत होता है, तो साधक के लिए ब्रह्मांड के समस्त रहस्य खुल जाते हैं। उसे किसी भी प्रकार के तंत्र-मंत्र, भय, ग्रहदोष या अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।
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६. दशैं सप्तमी पूजा विधि व गुड़ का विशेष भोग

फूलपाती और कालरात्रि की पूजा अत्यंत नियमपूर्वक की जाती है:

प्रातःकाल फूलपाती प्रवेश: सुबह शुभ मुहूर्त में नवपत्रिका को गंगाजल से स्नान कराकर, लाल चुनरी लपेटकर दशैं घर में स्थापित करें।

वस्त्र चयन: इस दिन नीले (Royal Blue), गहरे बैंगनी या लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।

रात्रि कालीन कालरात्रि पूजा (निशा पूजा): सप्तमी की रात्रि को विशेष तांत्रिक व वैदिक पूजा की जाती है। मां को रात की रानी के पुष्प, लाल जवाकुसुम, अक्षत और धूप अर्पित करें।

गुड़ का महाभोग: मां कालरात्रि को शुद्ध गुड़ (Jaggery) का भोग लगाना अनिवार्य है। इसके अलावा गुड़ से बने मालपुए या गुड़ की खीर भी अर्पित की जाती है। पूजा के पश्चात इस गुड़ का आधा भाग ब्राह्मणों/दान में देना चाहिए और आधा भाग परिवार को ग्रहण करना चाहिए। इससे परिवार में कभी दरिद्रता और आकस्मिक संकट नहीं आता।

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७. मां कालरात्रि के सिद्ध मंत्र एवं स्तुति

सिद्ध ध्यान श्लोक:

*एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।*
*लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥*
*वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।*
*वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥*

उपासना मंत्र:

*ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः।*

शुभंकरी स्तुति:

या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
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८. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ - AEO Insights)

# प्र.१: फूलपाती के दिन नेपाल और पहाड़ी क्षेत्रों में क्या विशेष परंपरा होती है?

उत्तर: फूलपाती के दिन नौ पवित्र पौधों (नवपत्रिका) को सेना की सलामी और बाजे-गाजे के साथ दशैं घर में प्रवेश कराया जाता है। इसी दिन से पूरे देश में दशैं की मुख्य छुट्टियां और पारिवारिक मिलन समारोह शुरू होते हैं।

# प्र.२: मां कालरात्रि को 'शुभंकरी' क्यों कहा जाता है?

उत्तर: यद्यपि मां कालरात्रि का रूप अत्यंत भयानक और उग्र है, परंतु वे सदैव अपने भक्तों का शुभ और मंगल करती हैं। वे केवल दुष्टों और असुरों के लिए भयानक हैं, अतः उन्हें 'शुभंकरी' कहा जाता है।

# प्र.३: सातवें दिन किस ग्रह के कष्ट दूर होते हैं?

उत्तर: मां कालरात्रि की पूजा से शनि ग्रह (Saturn) और राहु-केतु के भयंकर से भयंकर दोष व साढ़ेसाती का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

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💡 निष्कर्ष एवं आठवें दिन का पूर्वावलोकन

फूलपाती प्रकृति की संजीवनी का हमारे घर में प्रवेश है, और मां कालरात्रि हमारे अंतःकरण के समस्त अज्ञान और भय को भस्म करने वाली महाज्वाला हैं। सप्तमी की इस अलौकिक रात्रि के बाद, अगले दिन दुर्गा दशैं का सबसे महत्वपूर्ण और शक्ति-संपन्न दिन आएगा—'महाअष्टमी', जिसमें महागौरी पूजा, कालरात्रि बलि विधान, खड्ग पूजा और कन्या पूजन किया जाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

फूलपाती के दिन नेपाल और पहाड़ी क्षेत्रों में क्या विशेष परंपरा होती है?
फूलपाती के दिन नौ पवित्र पौधों (नवपत्रिका) को सेना की सलामी और बाजे-गाजे के साथ दशैं घर में प्रवेश कराया जाता है। इसी दिन से पूरे देश में दशैं की मुख्य छुट्टियां और पारिवारिक मिलन समारोह शुरू होते हैं।
मां कालरात्रि को 'शुभंकरी' क्यों कहा जाता है?
यद्यपि मां कालरात्रि का रूप अत्यंत भयानक और उग्र है, परंतु वे सदैव अपने भक्तों का शुभ और मंगल करती हैं। वे केवल दुष्टों और असुरों के लिए भयानक हैं, अतः उन्हें 'शुभंकरी' कहा जाता है।
सातवें दिन किस ग्रह के कष्ट दूर होते हैं?
मां कालरात्रि की पूजा से **शनि ग्रह (Saturn)** और **राहु-केतु** के भयंकर से भयंकर दोष व साढ़ेसाती का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

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