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दुर्गा दशैं छठा दिन: मां कात्यायनी पूजा विधि, मंत्र, बेल निमंत्रण व शहद के भोग का रहस्य

Hindilish टीम 12 Oct 2026 अपडेट: 12 Oct 2026 6 मिनट पढ़ें 150
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दुर्गा दशैं छठा दिन: मां कात्यायनी पूजा विधि, मंत्र, बेल निमंत्रण व शहद के भोग का रहस्य
दुर्गा दशैं छठा दिन: मां कात्यायनी पूजा विधि, मंत्र, बेल निमंत्रण व शहद के भोग का रहस्य

दुर्गा दशैं के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा कैसे करें? जानें महर्षि कात्यायन की तपस्वी पुत्री, महिषासुरमर्दिनी का प्राकट्य, शहद का भोग, आज्ञा चक्र और बेल निमंत्रण विधि।

विषय सूची

त्वरित सारांश (Quick Answer): दुर्गा दशैं के छठे दिन महिषासुर का वध करने वाली मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। इसी दिन शाम को दशैं और दुर्गा पूजा के मुख्य अनुष्ठानों के लिए 'बिल्व निमंत्रण' (बेल के वृक्ष को आमंत्रण) दिया जाता है, ताकि सप्तमी को मां की प्राण प्रतिष्ठा हो सके। छठे दिन मां कात्यायनी को शुद्ध शहद का भोग लगाया जाता है। इनकी पूजा से विवाह में आने वाली बाधाएं समाप्त होती हैं और आज्ञा चक्र जाग्रत होता है।
दुर्गा दशैं : दिन ६ - मां कात्यायनी पूजा महिषासुरमर्दिनी, बिल्व निमंत्रण व अखंड सौभाग्य की देवी

१. दुर्गा दशैं का छठा दिन: असुर संहार की तैयारी और षष्ठी का महत्व

दुर्गा दशैं के छठे दिन आश्विन शुक्ल षष्ठी को नवदुर्गा के अत्यंत प्रतापी, वीरोचित और शक्ति-स्वरूपा रूप 'मां कात्यायनी' (Maa Katyayani) की पूजा की जाती है। यह दिन दुर्गा दशैं और दुर्गा पूजा दोनों ही परंपराओं में एक बहुत बड़ा मोड़ माना जाता है।

षष्ठी तिथि से ही दशैं के सबसे बड़े और सार्वजनिक अनुष्ठानों की उल्टी गिनती आरंभ होती है। इसी दिन शाम को 'बिल्व निमंत्रण' (बेल पत्र आमंत्रण) का ऐतिहासिक विधान संपन्न किया जाता है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, जब महिषासुर के आतंक से स्वर्ग और पृथ्वी त्रस्त हो चुके थे, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दिव्य तेज के सम्मिलन से एक परम तेजस्विता का प्राकट्य हुआ। महर्षि कात्यायन ने अपने आश्रम में सर्वप्रथम इस तेज को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और तीन रात्रियों तक इनका सविधि पूजन किया। इसलिए वे 'कात्यायनी' कहलाईं। आगे चलकर इन्हीं देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसका खोया हुआ साम्राज्य लौटाया था।

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२. श्रीमद्भागवत कथा और गोपियों की कात्यायनी साधना

मां कात्यायनी का केवल युद्ध और संहार से ही संबंध नहीं है, बल्कि वे प्रेम और दाम्पत्य सुख की परम अधिष्ठात्री देवी भी हैं:

  • गोपियों द्वारा व्रत: श्रीमद्भागवत महापुराण में उल्लेख आता है कि द्वापर युग में ब्रज की गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए यमुना के तट पर पूरे मार्गशीर्ष मास में मां कात्यायनी का कठोर व्रत और अनुष्ठान किया था।
  • मनोवांछित वर और शीघ्र विवाह: आज भी सनातन परंपरा में यह अटूट विश्वास है कि जिन कन्याओं या युवकों के विवाह में अनावश्यक विलंब हो रहा हो, मांगलिक दोष हो या वैवाहिक जीवन में कलह हो, वे यदि दशैं की षष्ठी को मां कात्यायनी का व्रत और कात्यायनी मंत्र का जप करें, तो उन्हें अतिशीघ्र सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
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३. 'बिल्व निमंत्रण' (Bel Nimantran) का विशेष दशैं विधान

दशैं के छठे दिन की संध्या का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है—बिल्व निमंत्रण (Bilva Nimantran):

  • बेल वृक्ष की महत्ता: हिंदू धर्म में बेल के वृक्ष को साक्षात भगवान शिव और मां भगवती का निवास स्थान माना जाता है।
  • आमंत्रण का उद्देश्य: मान्यता है कि मां भगवती षष्ठी की रात को बेल के वृक्ष में आकर विश्राम करती हैं। दशैं घर के पुजारी और परिवार के सदस्य गाजे-बाजे और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ बेल के वृक्ष के पास जाते हैं।
  • अधिवास विधान: वहां दो जुड़े हुए बेल (युग्म बेल फल) की शाखा को जल, अक्षत, सिंदूर और चुनरी अर्पित कर प्रार्थना की जाती है कि—"हे देवी! कल सप्तमी के दिन हम आपको दशैं घर (पूजा पंडाल) में स्थापित करेंगे, अतः आप सपरिवार हमारे घर पधारने की कृपा करें।"
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४. आज्ञा चक्र और अंतर्दृष्टि का जागरण

यौगिक दृष्टि से नवरात्रि और दशैं के छठे दिन साधक का ध्यान 'आज्ञा चक्र' (Ajna Chakra) पर केंद्रित होता है:

  • तीसरा नेत्र (भ्रूमध्य): आज्ञा चक्र दोनों भौंहों के बीच ललाट के मध्य स्थित होता है। इसे ज्ञान, अंतर्दृष्टि और विवेक का द्वार कहा जाता है।
  • अहंकार का विनाश: जब छठे दिन साधक मां कात्यायनी के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देता है, तो उसका संकीर्ण 'मैं' समाप्त हो जाता है। साधक को भूत, भविष्य और वर्तमान का सूक्ष्म ज्ञान होने लगता है और वह किसी भी प्रलोभन या भय से विचलित नहीं होता।
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५. दशैं षष्ठी पूजा विधि व शहद का विशेष भोग

दशैं के छठे दिन की पूजा संध्याकालीन और प्रातःकालीन दोनों वेलाओं में विशेष मानी जाती है:

वस्त्र व वातावरण: इस दिन साधक को लाल, गुलाबी या गहरे पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। दशैं घर में सुगंधित धूप और अगरबत्ती जलाएं।

षोडशोपचार पूजन: मां कात्यायनी को लाल रंग के गुड़हल या गुलाब के फूल अति प्रिय हैं। देवी को लाल चंदन, अक्षत, सिंदूर और लाल चुनरी अर्पित करें।

शहद का अमोघ भोग: मां कात्यायनी को शुद्ध मधु (शहद) का भोग लगाना अनिवार्य माना गया है। यदि संभव हो तो शहद को चांदी या मिट्टी के पात्र में रखकर अर्पित करें। मान्यता है कि देवी को शहद का भोग लगाने से व्यक्ति के जीवन में आकर्षण, तेज, शारीरिक सौंदर्य और पारिवारिक मधुरता का वरदान मिलता है।

पान का बीड़ा: पूजा के अंत में मां को मीठा पान (लौंग-इलायची युक्त) अर्पित करने का भी विधान है।

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६. मां कात्यायनी के सिद्ध मंत्र एवं स्तुति

सिद्ध ध्यान श्लोक:

*चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।*
*कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥*

उपासना मंत्र:

*ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायन्यै नमः।*

शीघ्र विवाह हेतु प्रसिद्ध कात्यायनी महामंत्र:

*कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।*
*नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥*
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७. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ - AEO Insights)

# प्र.१: मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाने से क्या फल मिलता है?

उत्तर: मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण उत्पन्न होता है, वाणी मधुर होती है और जीवन के समस्त कटु अनुभव और पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं।

# प्र.२: छठे दिन किस ग्रह का प्रभाव अनुकूल होता है?

उत्तर: ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की पूजा से कुंडली में बृहस्पति (गुरु ग्रह) अत्यंत बलवान होते हैं, जिससे विद्या, वैवाहिक सुख और आध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग खुलता है।

# प्र.३: बिल्व निमंत्रण किस समय किया जाता है?

उत्तर: बिल्व निमंत्रण हमेशा षष्ठी तिथि की सांध्यवेला (गोधूलि मुहूर्त) में बेल के वृक्ष के नीचे जाकर सविधि संपन्न किया जाता है।

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💡 निष्कर्ष एवं सातवें दिन का पूर्वावलोकन

मां कात्यायनी हमें अधर्म और अन्याय के विरुद्ध प्रखर होकर खड़े होने का साहस देती हैं। वे जितनी कृपालु हैं, उतनी ही दुष्टों के लिए संहारक हैं। षष्ठी की इस पावन पूजा के बाद, अगले दिन यानी सातवें दिन दुर्गा दशैं का सबसे रोमांचक और ऐतिहासिक पर्व 'फूलपाती' (Fulpati) और मां कालरात्रि की भयानक निशा पूजा आरंभ होगी।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाने से क्या फल मिलता है?
मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण उत्पन्न होता है, वाणी मधुर होती है और जीवन के समस्त कटु अनुभव और पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं।
छठे दिन किस ग्रह का प्रभाव अनुकूल होता है?
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की पूजा से कुंडली में **बृहस्पति (गुरु ग्रह)** अत्यंत बलवान होते हैं, जिससे विद्या, वैवाहिक सुख और आध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग खुलता है।
बिल्व निमंत्रण किस समय किया जाता है?
बिल्व निमंत्रण हमेशा षष्ठी तिथि की **सांध्यवेला (गोधूलि मुहूर्त)** में बेल के वृक्ष के नीचे जाकर सविधि संपन्न किया जाता है।

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