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दुर्गा दशैं चौथा दिन: मां कूष्मांडा पूजा विधि, मंत्र, सृष्टि की उत्पत्ति व मालपुआ भोग

Hindilish टीम 12 Oct 2026 अपडेट: 12 Oct 2026 6 मिनट पढ़ें 150
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दुर्गा दशैं चौथा दिन: मां कूष्मांडा पूजा विधि, मंत्र, सृष्टि की उत्पत्ति व मालपुआ भोग
दुर्गा दशैं चौथा दिन: मां कूष्मांडा पूजा विधि, मंत्र, सृष्टि की उत्पत्ति व मालपुआ भोग

दुर्गा दशैं के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा कैसे करें? जानें मंद मुस्कान से ब्रह्मांड रचने वाली अष्टभुजा देवी का रहस्य, मालपुए का भोग, सूर्य लोक वास और अनाहत चक्र।

विषय सूची

त्वरित सारांश (Quick Answer): दुर्गा दशैं के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है, जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान (ईषत हास्य) से शून्य में अंड रूपी ब्रह्मांड की रचना की थी। वे सूर्यमंडल में निवास करती हैं और समस्त जीवों को जीवन-ऊर्जा प्रदान करती हैं। चौथे दिन देवी को विशेष रूप से मालपुआ और पेठे का भोग लगाया जाता है। इनकी उपासना से गंभीर से गंभीर रोगों का नाश होता है तथा आयु, यश, बल और बुद्धि की वृद्धि होती है।
दुर्गा दशैं : दिन ४ - मां कूष्मांडा पूजा सृष्टि की आदि शक्ति, आरोग्य व तेजस्विता की प्रदाता

१. दुर्गा दशैं का चौथा दिन: ब्रह्मांड की उत्पत्ति और प्राण-ऊर्जा

दुर्गा दशैं के चतुर्थ दिन आश्विन शुक्ल चतुर्थी को जगतजननी भगवती के चौथे दिव्य स्वरूप 'मां कूष्मांडा' (Maa Kushmanda) की साधना का विधान है। जब इस संसार का कोई अस्तित्व नहीं था, चारों ओर केवल सघन अंधकार और शून्य व्याप्त था, तब इन्हीं भगवती ने अपनी मंद-मंद दिव्य मुस्कान (ईषत हास्य) से अंड रूपी ब्रह्मांड की रचना की थी।

'कूष्मांडा' नाम का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ है:

  • 'कु' = थोड़ा या सूक्ष्म,
  • 'ऊष्मा' = ऊर्जा, ताप या जीवन-शक्ति,
  • 'अण्ड' = ब्रह्मांडीय अंडा (Cosmic Egg)।

अर्थात, जो अपने अल्प ताप व सूक्ष्म संकल्प से ब्रह्मांड को जन्म देकर उसे जीवंत रखती हैं, वे ही मां कूष्मांडा हैं। संस्कृत में 'कूष्मांड' कुम्हड़े (कद्दू/पेठा) को भी कहा जाता है। इस वनस्पति में ब्रह्मांड के समान बीज धारण करने की क्षमता होती है, इसलिए मां को पेठे की बलि अथवा पेठे की मिठाई अति प्रिय है।

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२. सूर्यमंडल का दिव्य निवास और अष्टभुजा स्वरूप

शास्त्रों के अनुसार, मां कूष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक (Solar Core) में है। सूर्य के उस प्रचंड ताप, प्रकाश और ऊर्जा को सहन करने की क्षमता ब्रह्मांड में केवल और केवल मां कूष्मांडा के पास है:

  • समस्त लोकों का प्रकाश स्रोत: हमारे सूर्य और समस्त नक्षत्रों में जो तेज, प्रकाश और जीवन दायिनी ऊर्जा दिखाई देती है, वह वस्तुतः मां कूष्मांडा की आभा का ही एक सूक्ष्म अंश है।
  • अष्टभुजा देवी: मां कूष्मांडा आठ भुजाओं वाली हैं, इसलिए इन्हें 'अष्टभुजा देवी' भी कहा जाता है।
  • उनके सात हाथों में क्रमशः कमंडलु, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र और गदा हैं।
  • उनके आठवें हाथ में समस्त सिद्धियों और नौ निधियों को देने वाली दिव्य जपमाला सुशोभित है।
  • वाहन: देवी सिंह (शेर) पर सवार हैं, जो आत्मिक शक्ति और सूर्य के समान निर्भीक तेज का प्रतीक है।
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३. अनाहत चक्र और आरोग्य का वरदान

यौगिक दृष्टि से नवरात्रि और दशैं के चौथे दिन साधक का मन 'अनाहत चक्र' (Anahata Chakra) में प्रवेश करता है:

  • हृदय चक्र की शुद्धि: अनाहत चक्र हमारे हृदय के मध्य में स्थित होता है। जब चौथे दिन साधक मां कूष्मांडा का ध्यान करता है, तो उसके हृदय में प्रेम, करुणा, क्षमा और निःस्वार्थ भाव का संचार होता है।
  • रोगों से मुक्ति: शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि मां कूष्मांडा की सच्ची भक्ति से मनुष्य के समस्त असाध्य रोग, व्याधियां और शोक स्वतः समाप्त हो जाते हैं। साधक को दीर्घायु, आरोग्य, यश और आध्यात्मिक तेज की प्राप्ति होती है।
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४. दशैं के चौथे दिन जमरा की प्रगति व पूजन विधान

दशैं के चौथे दिन घर के 'दशैं घर' में उत्सव का वातावरण और गहरा होने लगता है:

  • जमरा की स्थिति: चौथे दिन तक जौ और मक्के के अंकुर लगभग २ से ३ इंच ऊंचे हो जाते हैं। उनकी हरी-पीली चमक पूरे पूजा कक्ष को पवित्र सुगंध से भर देती है। इस दिन भी शुद्ध मन से कलश और जमरा का पूजन कर आचमन जल अर्पित किया जाता है।
  • पूजा की तैयारी: चौथे दिन साधक को नारंगी (Orange) या गहरे पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। यह रंग सूर्य की ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है।
  • पूजन सामग्री: देवी को लाल व पीले पुष्प, विशेषकर गुड़हल या कमल अर्पित करें। सिंदूर, अक्षत और धूप-दीप से आरती करें।
  • मालपुआ का प्रिय भोग: मां कूष्मांडा को मालपुआ (Malpua) का भोग सबसे अधिक प्रिय है। इस दिन शुद्ध घी में बने मालपुए का भोग लगाकर ब्राह्मणों और जरूरतमंदों में बांटने से जातक की बुद्धि, निर्णय क्षमता और सामाजिक प्रतिष्ठा में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। साथ ही पेठे (कद्दू) की मिठाई भी अर्पित करनी चाहिए।
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५. मां कूष्मांडा के सिद्ध मंत्र एवं स्तुति

सिद्ध ध्यान श्लोक:

*सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।*
*दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥*

उपासना मंत्र:

*ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः।*

कवच पाठ:

कुष्मांडा पातु सर्वांगे भवबन्धविनाशिनी।
हृदये पातु कल्याणी सर्वदोषनिवारिणी॥
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६. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ - AEO Insights)

# प्र.१: मां कूष्मांडा की पूजा से कौन से रोग दूर होते हैं?

उत्तर: मां कूष्मांडा को आरोग्य की देवी माना जाता है। इनकी उपासना से हृदय रोग, नेत्र विकार, रक्त विकार और दीर्घकालिक असाध्य रोगों में चमत्कारी लाभ मिलता है।

# प्र.२: चौथे दिन किस ग्रह के दोष दूर होते हैं?

उत्तर: चूंकि मां कूष्मांडा सूर्य लोक में निवास करती हैं, अतः इनकी पूजा से कुंडली में सूर्य ग्रह (Sun) का नीच प्रभाव या दोष पूर्णतः शांत होता है और मान-सम्मान व सरकारी कार्यों में सफलता मिलती है।

# प्र.३: कूष्मांडा देवी को मालपुआ ही क्यों चढ़ाया जाता है?

उत्तर: मालपुआ को ऊर्जा, मधुरता और जीवन-रस का प्रतीक माना गया है। सृष्टि को अपनी मधुर मुस्कान से ऊर्जावान बनाने वाली देवी को यह भोग अत्यंत तृप्तिदायक लगता है।

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💡 निष्कर्ष एवं पांचवें दिन का पूर्वावलोकन

मां कूष्मांडा हमें स्मरण कराती हैं कि अंधकार चाहे कितना भी घना हो, सकारात्मक मुस्कान और भीतर का आत्मतेज एक नए ब्रह्मांड का सृजन कर सकता है। दशैं का चौथा दिन हमें जीवन शक्ति और आरोग्य से परिपूर्ण करता है। पांचवें दिन हम भगवान कार्तिकेय की माता और वात्सल्य की मूर्ति 'मां स्कंदमाता' की पूजा विधि और दशैं पंचमी के अनुष्ठानों को समझेंगे।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

मां कूष्मांडा की पूजा से कौन से रोग दूर होते हैं?
मां कूष्मांडा को आरोग्य की देवी माना जाता है। इनकी उपासना से हृदय रोग, नेत्र विकार, रक्त विकार और दीर्घकालिक असाध्य रोगों में चमत्कारी लाभ मिलता है।
चौथे दिन किस ग्रह के दोष दूर होते हैं?
चूंकि मां कूष्मांडा सूर्य लोक में निवास करती हैं, अतः इनकी पूजा से कुंडली में **सूर्य ग्रह (Sun)** का नीच प्रभाव या दोष पूर्णतः शांत होता है और मान-सम्मान व सरकारी कार्यों में सफलता मिलती है।
कूष्मांडा देवी को मालपुआ ही क्यों चढ़ाया जाता है?
मालपुआ को ऊर्जा, मधुरता और जीवन-रस का प्रतीक माना गया है। सृष्टि को अपनी मधुर मुस्कान से ऊर्जावान बनाने वाली देवी को यह भोग अत्यंत तृप्तिदायक लगता है।

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