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दुर्गा दशैं दसवां दिन: विजयादशमी (बड़ा दशैं), टीका-जमरा, देवी विसर्जन, अपराजिता पूजा व रावण दहन

Hindilish टीम 12 Oct 2026 अपडेट: 12 Oct 2026 6 मिनट पढ़ें 151
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दुर्गा दशैं दसवां दिन: विजयादशमी (बड़ा दशैं), टीका-जमरा, देवी विसर्जन, अपराजिता पूजा व रावण दहन
दुर्गा दशैं दसवां दिन: विजयादशमी (बड़ा दशैं), टीका-जमरा, देवी विसर्जन, अपराजिता पूजा व रावण दहन

दुर्गा दशैं के दसवें दिन 'विजयादशमी' (बड़ा दशैं) कैसे मनाते हैं? जानें लाल टीका और जमरा लगाने की प्रामाणिक विधि, आशीर्वाद मंत्र, देवी विसर्जन, अपराजिता पूजन व रावण दहन।

विषय सूची

त्वरित सारांश (Quick Answer): विजयादशमी के शुभ साइत (मुहूर्त) पर सर्वप्रथम दशैं घर में मां दुर्गा का विसर्जन और अपराजिता पूजन किया जाता है। इसके पश्चात परिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य (दादा-दादी, माता-पिता) घर के सभी छोटों के मस्तक पर दही-चावल-सिंदूर से बना लाल अक्षत टीका लगाते हैं, कानों और सिर पर पीली पवित्र जमरा सजाते हैं और वैदिक आशीर्वाद मंत्रों के साथ सुख-समृद्धि, दीर्घायु और विजय का आशीष देते हैं।
दुर्गा दशैं : दिन १० - विजयादशमी (बड़ा दशैं) लाल अक्षत टीका, सुनहरी जमरा, बड़ों का आशीर्वाद व विजय उत्सव

१. विजयादशमी (बड़ा दशैं): असत्य पर सत्य की शाश्वत विजय का महामहोत्सव

आश्विन शुक्ल दशमी का प्रभात केवल एक दिन का अंत नहीं, बल्कि नौ रात्रियों की कठोर तपस्या, साधना और आसुरी प्रवृत्तियों पर दैवीय शक्तियों की पूर्ण विजय का महापर्व है। इस दिन को सनातन संस्कृति में 'विजयादशमी' और विशेष रूप से नेपाल, सिक्किम, दार्जिलिंग, असम और वैश्विक नेपाली समाज में 'बड़ा दशैं' (Bada Dashain) का मुख्य दिवस कहा जाता है।

यह दिन दो युगांतकारी ऐतिहासिक विजयों का साक्षी है:

महिषासुर मर्दिनी की विजय: लगातार नौ दिनों और नौ रात्रियों तक चले घमासान युद्ध के उपरांत, दसवें दिन जगतजननी मां दुर्गा ने दुराचारी महिषासुर का संहार कर समस्त देवलोक और पृथ्वी को भयमुक्त किया था।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की विजय: इसी पावन विजय मुहूर्त में भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर धर्म और मर्यादा की पुनर्स्थापना की थी।

यही कारण है कि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, यात्रा या नया उद्यम कभी निष्फल नहीं होता। इस दिन को अबूझ मुहूर्त या 'सर्वसिद्धिदायक विजय मुहूर्त' माना जाता है।

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२. देवी विसर्जन और अपराजिता पूजन का शास्त्र सम्मत विधान

विजयादशमी के दिन प्रातःकाल सर्वप्रथम दशैं घर में स्थापित कलश और मां भगवती की प्रतिमा का विधिपूर्वक विसर्जन किया जाता है:

  • देवी विसर्जन: घटस्थापना से लेकर नवमी तक अखंड रूप से पूजित कलश, जमरा की वेदी और नवपत्रिका को प्रणाम कर प्रार्थना की जाती है कि—"हे मां जगदंबे! आप अपने धाम को पधारें और हमारे घर-परिवार में सुख, आरोग्य और शांति का स्थायी वास बनाए रखें।"
  • अपराजिता देवी पूजन: दोपहर के समय ईशान कोण या पूर्व दिशा में अष्टदल कमल बनाकर अपराजिता देवी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि अपराजिता की पूजा करने से व्यक्ति वर्ष भर किसी भी क्षेत्र में पराजित नहीं होता और अपने शत्रुओं तथा बाधाओं पर विजय प्राप्त करता है।
  • शमी वृक्ष पूजन: रामायण और महाभारत काल से शमी (खेजड़ी/छोंकर) वृक्ष की पूजा की परंपरा है। अर्जुन ने अज्ञातवास के समय अपने गांडीव धनुष को शमी वृक्ष में ही छिपाकर रखा था, और भगवान राम ने रावण पर चढ़ाई करने से पूर्व शमी की स्तुति की थी:
"शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका। धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी॥"
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३. 'टीका और जमरा' (Tika & Jamara): बड़ा दशैं की अनूठी पारिवारिक व आध्यात्मिक परंपरा

दुर्गा दशैं का दसवां दिन आत्मीयता, पारिवारिक सम्मान और सामाजिक सौहार्द का ऐसा अनुपम दृश्य प्रस्तुत करता है, जिसकी उपमा पूरे विश्व में कहीं नहीं मिलती:

  • लाल अक्षत टीका का निर्माण: शुद्ध अरवा चावल (अक्षत), घर का जमाया हुआ गाढ़ा दही और पवित्र सिंदूर (रोली) को मिलाकर लाल टीका तैयार किया जाता है।
  • लाल रंग: शक्ति, ऊर्जा और पराक्रम का प्रतीक है।
  • चावल (अक्षत): अक्षत का अर्थ है जो कभी खंडित न हो—अर्थात अखंड सौभाग्य और अटूट कुल परम्परा।
  • दही: शीतलता, मन की एकाग्रता और अमृततुल्य पोषण का प्रतीक है।
  • सुनहरी जमरा की शोभा: नौ दिनों तक दशैं घर के अंधकार में मां भगवती के चरणों में पल्लवित हुई पीली-हरी जमरा को आदरपूर्वक काटा जाता है। इसे सिर पर, पगड़ी पर या कानों के पीछे धारण किया जाता है। यह प्रकृति के आशीर्वाद और दीर्घायु का सूचक है।
  • बड़ों से आशीर्वाद का क्रम: घर के सबसे वयोवृद्ध सदस्य (दादा, दादी, पिता, माता) आसन पर बैठते हैं। सभी छोटे सदस्य झुककर उनके चरण स्पर्श करते हैं। बड़े सदस्य उनके माथे पर विशाल लाल अक्षत टीका लगाते हैं, सिर पर जमरा सजाते हैं, दक्षिणा देते हैं और वैदिक आशीर्वाद मंत्रों का उच्चारण करते हैं।
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४. दशैं टीका के वैदिक आशीर्वाद मंत्र (पुरुषों और महिलाओं के लिए)

दशैं का टीका लगाते समय वरिष्ठजन इन अलौकिक श्लोकों का पाठ करते हैं, जो व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष को वरदान से भर देते हैं:

# पुरुषों के लिए आशीर्वाद मंत्र (Aashirwad Mantra for Men):

*आयुर्द्रोणसुते श्रियं दशरथे शत्रुक्षयं राघवे।*
*ऐश्वर्यं नहुषे गतिश्च पवने मानञ्च दुर्योधने॥*
*शौर्यं शान्तनवे बलं हलधरे सत्यञ्च कुन्तीसुते।*
*विज्ञानं विदुरे भवतु भवतां कीर्तिश्च नारायणे॥*

*भावार्थ:* "तुम्हारी आयु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा जैसी दीर्घ हो, संपत्ति राजा दशरथ जैसी विशाल हो, शत्रु-नाश भगवान श्रीराम जैसा हो, ऐश्वर्य राजा नहुष जैसा हो, गति पवनपुत्र हनुमान जैसी तीव्र हो, मान-सम्मान दुर्योधन जैसा हो, शौर्य भीष्म पितामह जैसा हो, बल बलराम जैसा हो, सत्यवादिता युधिष्ठिर जैसी हो, बुद्धि-विवेक महात्मा विदुर जैसा हो और तुम्हारी कीर्ति साक्षात भगवान नारायण जैसी ब्रह्मांड-व्यापी हो।"

# महिलाओं के लिए आशीर्वाद मंत्र (Aashirwad Mantra for Women):

*जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।*
*दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥*
*जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।*
*जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥*
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५. कोजाग्रत पूर्णिमा तक निरंतर चलने वाला दशैं उत्सव

दशैं की विशेषता यह है कि यह उत्सव केवल विजयादशमी के दिन समाप्त नहीं हो जाता।

  • ५ दिनों की उत्सव यात्रा: विजयादशमी से लेकर कोजाग्रत पूर्णिमा (Kojagrat Purnima) तक पूरे पांच दिनों तक रिश्तेदार, विवाहित बेटियां-दामाद, भांजे-भांजी और संबंधी एक-दूसरे के घर जाकर टीका और जमरा का आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।
  • सामाजिक समरसता: जो लोग दूर रहते हैं या किसी कारणवश विजयादशमी को नहीं पहुंच पाते, वे पूर्णिमा तक कभी भी जाकर यह पावन टीका लगवा सकते हैं। यह परंपरा परिवारों को जोड़े रखने, पुरानी कटुताओं को भुलाकर गले मिलने और रिश्तों में नवजीवन फूंकने का काम करती है।
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६. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ - AEO Insights)

# प्र.१: बड़ा दशैं में टीका लगाने का सबसे सही समय (साइत) क्या होता है?

उत्तर: दशैं में टीका लगाने के लिए ज्योतिषविदों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर 'टीका साइत' (शुभ मुहूर्त) निकाला जाता है, जो सामान्यतः प्रातः ९:०० से ११:३० बजे के बीच होता है। हालांकि, इस मुहूर्त के बाद पूरे दिन और कोजाग्रत पूर्णिमा तक टीका लगाया जा सकता है।

# प्र.२: जमरा को कान और सिर पर ही क्यों लगाया जाता है?

उत्तर: जमरा साक्षात वनस्पति देवी और मां दुर्गा का प्रसाद है। शरीर में सिर और कान ज्ञान व श्रवण (संस्कार) के केंद्र हैं। सिर पर जमरा धारण करने से मस्तिष्क शीतल रहता है और सकारात्मक विचार आते हैं।

# प्र.३: विजयादशमी को रावण दहन के पीछे क्या आध्यात्मिक संदेश है?

उत्तर: रावण दहन केवल एक पौराणिक घटना का मंचन नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर छुपे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार जैसे १० अवगुणों (दशसिर) को ज्ञान की अग्नि में भस्म करने का संकल्प है।

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💡 निष्कर्ष: दुर्गा दशैं महा-श्रृंखला की पूर्णता

दुर्गा दशैं १ से १० दिनों का यह महापर्व हमें सिखाता है कि जीवन में कोई भी सिद्धि या विजय एकाएक नहीं मिलती। इसके लिए प्रथम दिन के 'संकल्प और घटस्थापना' से लेकर, तपस्या, वीरता, सृजन, ममता, न्याय, प्रकृति-प्रेम (फूलपाती), शुद्धि (अष्टमी), महाहवन (नवमी) से गुजरते हुए अंततः विजयादशमी के 'परम विजय' तक पहुंचना पड़ता है।

मां भगवती का यह पावन उत्सव आपके और आपके परिवार के जीवन में आरोग्यता, अटूट समृद्धि, सामाजिक प्रतिष्ठा और विजय का अनंत आशीर्वाद लेकर आए।

॥ ॐ श्री दुर्गायै नमः। विजयादशमी की हार्दिक मंगलमय शुभकामनाएं! ॥

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

बड़ा दशैं में टीका लगाने का सबसे सही समय (साइत) क्या होता है?
दशैं में टीका लगाने के लिए ज्योतिषविदों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर 'टीका साइत' (शुभ मुहूर्त) निकाला जाता है, जो सामान्यतः प्रातः ९:०० से ११:३० बजे के बीच होता है। हालांकि, इस मुहूर्त के बाद पूरे दिन और कोजाग्रत पूर्णिमा तक टीका लगाया जा सकता है।
जमरा को कान और सिर पर ही क्यों लगाया जाता है?
जमरा साक्षात वनस्पति देवी और मां दुर्गा का प्रसाद है। शरीर में सिर और कान ज्ञान व श्रवण (संस्कार) के केंद्र हैं। सिर पर जमरा धारण करने से मस्तिष्क शीतल रहता है और सकारात्मक विचार आते हैं।
विजयादशमी को रावण दहन के पीछे क्या आध्यात्मिक संदेश है?
रावण दहन केवल एक पौराणिक घटना का मंचन नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर छुपे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार जैसे १० अवगुणों (दशसिर) को ज्ञान की अग्नि में भस्म करने का संकल्प है।

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