जून 1983 से पहले तक भारतीय क्रिकेट को अंतरराष्ट्रीय मंच पर गंभीरता से नहीं लिया जाता था। पिछले दो विश्व कपों (1975 और 1979) में भारत ने केवल एक मैच जीता था, वह भी ईस्ट अफ्रीका के खिलाफ। लेकिन 24 साल के युवा कप्तान कपिल देव और उनकी 'कपिल्स डेविल्स' ने लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर वह इतिहास रचा जिसने भारत में क्रिकेट की तकदीर हमेशा के लिए बदल दी।
टनब्रिज वेल्स का चमत्कार: कपिल देव के 175* रन
जिम्बाब्वे के खिलाफ करो या मरो के मुकाबले में भारत की शुरुआत भयानक रही। केवल 17 रन पर 5 शीर्ष बल्लेबाज (गावस्कर, श्रीकांत, अमरनाथ, संदीप पाटिल, यशपाल शर्मा) पवेलियन लौट चुके थे। उस समय कप्तान कपिल देव नहा रहे थे।
वे मैदान पर उतरे और 138 गेंदों में 16 चौकों और 6 छक्कों की मदद से नाबाद 175 रन की ऐसी पारी खेली जिसे क्रिकेट इतिहास की सर्वश्रेष्ठ वनडे पारियों में गिना जाता है। दुर्भाग्य से बीबीसी की हड़ताल के कारण इस पारी की कोई वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद नहीं है!
25 जून 1983: लॉर्ड्स का ऐतिहासिक फाइनल
फाइनल में दो बार की अजेय विश्व चैंपियन क्लाइव लॉयड की वेस्टइंडीज टीम सामने थी जिसमें विवियन रिचर्ड्स, माइकल होल्डिंग, मैल्कम मार्शल और जोएल गार्नर जैसे खूंखार खिलाड़ी थे।
- भारत पहले बल्लेबाजी करते हुए मात्र 183 रनों पर ऑल आउट हो गया। मोहिंदर अमरनाथ और श्रीकांत (38) ने संघर्ष किया।
- विवियन रिचर्ड्स 28 गेंदों में 33 रन बनाकर मैच छीन रहे थे। तभी मदन लाल की गेंद पर कपिल देव ने उल्टी दिशा में पीछे की ओर लगभग 20 गज दौड़कर एक अकल्पनीय कैच लपका।
- रिचर्ड्स के आउट होते ही वेस्टइंडीज की बल्लेबाजी बिखर गई। मोहिंदर अमरनाथ ने 12 रन देकर 3 विकेट और मदन लाल ने 3 विकेट लेकर पूरी कैरेबियाई टीम को 140 रनों पर ढेर कर दिया।
- भारत 43 रनों से मैच जीतकर विश्व चैंपियन बना और लॉर्ड्स की बालकनी में कपिल देव ने प्रूडेंशियल ट्रॉफी उठाई।